पड़ोसी द्वारा ज़मीन / प्रॉपर्टी पर कब्ज़ा – कानूनी उपाय और सिविल केस प्रक्रिया
यह लेख The Legal Warning India द्वारा प्रकाशित किया गया है और इसे एडवोकेट उदय सिंह द्वारा लिखा गया है।
भारत में प्रॉपर्टी से जुड़े विवाद सबसे ज़्यादा देखने को मिलते हैं। इन्हीं में से एक बहुत आम समस्या है – पड़ोसी द्वारा ज़मीन या मकान के हिस्से पर अवैध कब्ज़ा (Property Encroachment)।
अक्सर यह समस्या धीरे-धीरे शुरू होती है –
कभी दीवार थोड़ी आगे बढ़ा दी जाती है,
कभी रास्ता बंद कर दिया जाता है,
तो कभी खाली ज़मीन पर निर्माण शुरू कर दिया जाता है।
जब तक मालिक को समझ आता है, तब तक कब्ज़ा लगभग स्थायी हो चुका होता है।
ऐसे में सबसे आम सवाल होता है:
“मेरे पड़ोसी ने मेरी ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया है, अब मैं क्या कानूनी कार्रवाई कर सकता हूँ?”
इस लेख में हम आपको सरल भाषा में बताएँगे कि प्रॉपर्टी एन्क्रोचमेंट क्या होता है, कोर्ट इसे कैसे देखती है और इससे छुटकारा पाने के लिए कौन-कौन से कानूनी उपाय मौजूद हैं।
प्रॉपर्टी एन्क्रोचमेंट (Encroachment) क्या होता है?
जब कोई व्यक्ति बिना कानूनी अधिकार के किसी और की ज़मीन या संपत्ति पर कब्ज़ा कर ले, तो उसे प्रॉपर्टी एन्क्रोचमेंट कहा जाता है।
यह कब्ज़ा निम्न तरीकों से हो सकता है:
- अवैध निर्माण करना
- सीमा (Boundary) आगे बढ़ा देना
- खुली ज़मीन पर कब्ज़ा
- रास्ता या एंट्री ब्लॉक करना
- धीरे-धीरे ज़मीन हड़पना
भारत में प्रॉपर्टी कब्ज़े के मामले क्यों बढ़ रहे हैं?
- सीमा स्पष्ट न होना
- पुराने कागज़ात
- परिवार में मौखिक बंटवारा
- मालिक का दूर रहना
- समय पर कार्रवाई न करना
कब्ज़ा करने वाला अक्सर मालिक की चुप्पी और देरी का फायदा उठाता है।
क्या प्रॉपर्टी कब्ज़ा सिविल मामला है या क्रिमिनल?
अधिकतर मामलों में प्रॉपर्टी एन्क्रोचमेंट एक सिविल (दीवानी) मामला होता है।
लेकिन अगर:
- जबरदस्ती या धमकी दी जाए
- फर्जी दस्तावेज़ बनाए जाएँ
- जानबूझकर ज़मीन हड़पी जाए
तो मामला क्रिमिनल रूप भी ले सकता है।
पहला कदम – अपने मालिकाना हक़ की जाँच करें
कोर्ट जाने से पहले आपको ये दस्तावेज़ इकट्ठा करने चाहिए:
- रजिस्ट्री / सेल डीड
- खसरा / खतौनी / रेवेन्यू रिकॉर्ड
- नक्शा / साइट प्लान
- नगर निगम या पंचायत रिकॉर्ड
मजबूत कागज़ात ही आपका सबसे बड़ा हथियार होते हैं।
पड़ोसी के कब्ज़े के खिलाफ कानूनी उपाय
1. लीगल नोटिस भेजना
सबसे पहला और असरदार कदम है लीगल नोटिस भेजना।
लीगल नोटिस में:
- अपना मालिकाना हक़ बताया जाता है
- अवैध कब्ज़े का ज़िक्र होता है
- कब्ज़ा हटाने की माँग की जाती है
- कोर्ट केस की चेतावनी दी जाती है
कई मामले नोटिस स्टेज पर ही सुलझ जाते हैं।
2. स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction)
अगर कब्ज़ा बढ़ने का खतरा हो, तो कोर्ट से रोक लगाने के लिए केस किया जाता है।
3. अनिवार्य निषेधाज्ञा (Mandatory Injunction)
अगर कब्ज़ा हो चुका है, तो अवैध निर्माण हटाने के लिए यह केस किया जाता है।
4. कोर्ट द्वारा ज़मीन की नाप-जोख (Demarcation)
कोर्ट राजस्व अधिकारियों से ज़मीन की सीमाएँ तय करवा सकती है।
5. कब्ज़ा वापसी का मुकदमा
अगर ज़मीन पूरी तरह छीन ली गई हो, तो Possession Suit दायर किया जाता है।
अगर पड़ोसी “Adverse Possession” का दावा करे तो?
कब्ज़ा करने वाले अक्सर यह तर्क देते हैं कि वे सालों से वहाँ रह रहे हैं।
लेकिन कोर्ट इसके लिए सख्त शर्तें देखती है। हर कब्ज़ा मालिकाना हक़ नहीं देता।
देरी करने से क्या नुकसान होता है?
- कब्ज़ा मजबूत हो जाता है
- सबूत कमजोर पड़ते हैं
- केस मुश्किल हो जाता है
जितनी जल्दी कार्रवाई, उतना मजबूत केस।
लोग कौन-सी गलतियाँ करते हैं?
- शुरुआत में चुप रहना
- सिर्फ़ मौखिक विरोध
- लीगल नोटिस न भेजना
- सालों तक इंतज़ार
प्रॉपर्टी बचाने के लिए सुझाव
- समय-समय पर निरीक्षण करें
- सीमा स्पष्ट रखें
- फोटो और वीडियो रखें
- शुरुआत में ही कानूनी कदम उठाएँ
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q. क्या पुलिस कब्ज़ा हटवा सकती है?
आमतौर पर नहीं, कोर्ट ऑर्डर ज़रूरी होता है।
Q. क्या निर्माण तुड़वाया जा सकता है?
हाँ, कोर्ट के आदेश से।
Q. क्या लीगल नोटिस ज़रूरी है?
कानूनी रूप से हमेशा नहीं, लेकिन बहुत ज़रूरी है।
यह लेख केवल सामान्य कानूनी जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की कानूनी सलाह या याचना नहीं है। यह लेख बार काउंसिल ऑफ इंडिया नियम 36 के अनुरूप है।





















