This article is published by The Legal Warning India and written by Advocate Uday Singh.
FIR दर्ज कराने के बाद केस वापस क्यों नहीं लिया जा सकता? पूरी कानूनी सच्चाई
अक्सर लोगों को यह गलतफहमी होती है कि अगर FIR दर्ज हो गई और बाद में शिकायतकर्ता व आरोपी के बीच समझौता हो जाए,
तो केस अपने-आप वापस ले लिया जाएगा।
लेकिन सच्चाई यह है कि FIR दर्ज होने के बाद केस वापस लेना आसान नहीं होता और कई मामलों में यह कानूनन संभव ही नहीं होता।
आपके द्वारा साझा की गई समाचार रिपोर्ट इसी कानूनी वास्तविकता को उजागर करती है।
यह लेख भारतीय दंड प्रक्रिया, सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों और सार्वजनिक समाचार स्रोतों पर आधारित है।
FIR दर्ज होने के बाद केस क्यों “व्यक्तिगत” नहीं रहता?
जब कोई FIR दर्ज होती है, तो मामला:
- सिर्फ शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच नहीं रहता
- राज्य (State) बनाम आरोपी बन जाता है
- समाज के खिलाफ अपराध माना जाता है
इसीलिए FIR दर्ज होते ही सरकार (State) केस की पक्षकार बन जाती है।
क्या हर केस में समझौते से FIR खत्म हो सकती है?
नहीं।
केवल समझौतावादी (Compounding) अपराध ही आपसी समझौते से खत्म किए जा सकते हैं।
ये आमतौर पर हल्के और निजी प्रकृति के अपराध होते हैं।
कौन-से केस समझौते से वापस लिए जा सकते हैं?
भारतीय कानून के अनुसार, निम्न जैसे मामले सीमित शर्तों पर समझौते से खत्म हो सकते हैं:
- साधारण मारपीट
- छोटी गाली-गलौज
- रास्ता रोकना
- कुछ मानहानि से जुड़े मामले
इन मामलों में भी अदालत की अनुमति जरूरी होती है।
गैर-समझौतावादी (Non-Compoundable) केस क्या होते हैं?
ज्यादातर गंभीर अपराध जैसे:
- दहेज उत्पीड़न (498A)
- धोखाधड़ी
- बलात्कार
- हत्या या हत्या का प्रयास
- जालसाजी
इन मामलों में केवल समझौता होने से केस वापस नहीं लिया जा सकता।
Dahej Uttpidan Pure pariwar k khilaf F.i.r
तो ऐसे मामलों में केस कैसे खत्म होता है?
गैर-समझौतावादी मामलों में:
- हाई कोर्ट में FIR Quashing की याचिका
- अदालत यह देखती है कि अपराध निजी है या समाज के खिलाफ
अगर अदालत को लगे कि मामला व्यक्तिगत विवाद का है और समाज पर असर नहीं पड़ेगा,
तो ही केस रद्द किया जाता है।
हाई कोर्ट की भूमिका क्यों जरूरी होती है?
समाचार में भी बताया गया है कि कई बार:
- समझौता हो जाने के बावजूद
- निचली अदालत केस वापस नहीं कर सकती
ऐसे में केवल हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट ही केस रद्द करने का आदेश दे सकती है।
मर्डर, रेप जैसे केस समझौते से क्यों नहीं खत्म होते?
क्योंकि ये अपराध:
- सिर्फ एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं
- पूरे समाज के खिलाफ माने जाते हैं
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि गंभीर अपराधों में समझौते के आधार पर केस रद्द नहीं हो सकता।
लोग सबसे बड़ी गलती क्या करते हैं?
- पहले FIR दर्ज करा देते हैं
- फिर समझौते की उम्मीद करते हैं
- कानूनी प्रक्रिया को नहीं समझते
FIR दर्ज कराना एक गंभीर कानूनी कदम है, भावनात्मक फैसला नहीं।
निष्कर्ष
FIR दर्ज होने के बाद केस वापस लेना शिकायतकर्ता के हाथ में नहीं रहता।
केवल कानून, अदालत और अपराध की प्रकृति तय करती है कि केस खत्म होगा या नहीं।
इसीलिए FIR दर्ज कराने से पहले और बाद में सही कानूनी जानकारी होना बेहद जरूरी है।
Disclaimer: यह लेख केवल सामान्य कानूनी जानकारी और जन-जागरूकता के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। यह किसी प्रकार की कानूनी सलाह या सॉलिसिटेशन नहीं है। यह संचार Bar Council of India Rule 36 के अनुरूप है।





















