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फर्जी सिविल केस में FIR कब हो सकती है? झूठे मुकदमे पर आपराधिक कार्रवाई कब और कैसे संभव है

यह लेख The Legal Warning India द्वारा प्रकाशित किया गया है और Advocate Uday Singh द्वारा लिखा गया है।

भारत में आजकल यह बहुत आम हो गया है कि लोग दबाव बनाने, प्रॉपर्टी रोकने या जबरन समझौता कराने के लिए फर्जी (झूठा) सिविल केस दर्ज करा देते हैं।
ऐसे मामलों में पीड़ित व्यक्ति सबसे पहले यही पूछता है:

“अगर मेरे खिलाफ झूठा सिविल मुकदमा किया गया है, तो क्या मैं FIR दर्ज करा सकता हूँ?”

इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे:

  • फर्जी सिविल केस क्या होता है
  • सिविल और क्रिमिनल केस में अंतर
  • फर्जी सिविल केस में FIR कब संभव होती है
  • कब FIR नहीं हो सकती
  • सही और सुरक्षित कानूनी रणनीति क्या है

फर्जी (झूठा) सिविल केस क्या होता है?

जब कोई व्यक्ति:

  • बिना किसी वैध अधिकार के मुकदमा दायर करे
  • झूठे तथ्य या नकली दस्तावेज लगाए
  • महत्वपूर्ण बातें कोर्ट से छुपाए
  • सिर्फ परेशान करने के लिए केस करे

तो ऐसे मुकदमे को फर्जी या झूठा सिविल केस कहा जाता है।

ध्यान रखें:
हर वह केस जो आप जीत जाते हैं, वह अपने आप में आपराधिक (Criminal) नहीं बन जाता।


सिविल केस और क्रिमिनल केस में अंतर

  • सिविल केस – संपत्ति, पैसा, समझौता, अधिकार से संबंधित
  • क्रिमिनल केस – धोखाधड़ी, जालसाजी, कूटरचना, झूठी गवाही जैसे अपराध

केवल सिविल विवाद होने से FIR दर्ज नहीं होती।
आपराधिक मंशा (Criminal Intention) का होना जरूरी है।


फर्जी सिविल केस में FIR कब दर्ज हो सकती है?

निम्न परिस्थितियों में फर्जी सिविल केस के साथ FIR संभव हो सकती है:

1️⃣ झूठे या जाली दस्तावेज लगाए गए हों

  • फर्जी बिक्री विलेख (Sale Deed)
  • नकली वसीयत (Will)
  • झूठा एग्रीमेंट

➡ यह सीधा आपराधिक अपराध बनता है।

2️⃣ अदालत में झूठा हलफनामा या बयान दिया गया हो

  • जानबूझकर गलत तथ्य बताना
  • झूठी पुष्टि (False Verification)

➡ इसे झूठी गवाही (Perjury) माना जाता है।

3️⃣ जानबूझकर महत्वपूर्ण तथ्य छुपाए गए हों

  • पहले से रजिस्टर्ड दस्तावेज छुपाना
  • पुराने मुकदमे की जानकारी न देना

➡ यह धोखाधड़ी और कोर्ट की प्रक्रिया का दुरुपयोग हो सकता है।

4️⃣ केवल परेशान करने के उद्देश्य से केस किया गया हो

अगर कोर्ट को यह लगे कि:

  • केस का कोई कानूनी आधार नहीं
  • यह सिर्फ दबाव बनाने की रणनीति है

➡ तब आपराधिक कार्रवाई का रास्ता खुलता है।


क्या सीधे FIR दर्ज कराई जा सकती है?

महत्वपूर्ण नियम:

कोर्ट में कही गई बातों के आधार पर आमतौर पर सीधे FIR दर्ज नहीं की जा सकती

अधिकतर मामलों में:

  • कोर्ट की अनुमति आवश्यक होती है
  • कोर्ट स्वयं शिकायत दर्ज करने का आदेश देती है

इसलिए बिना सही कानूनी सलाह के FIR कराना खुद के लिए नुकसानदायक हो सकता है।


पहले कौन-से कानूनी कदम उठाना जरूरी है?

  • फर्जी सिविल केस को खारिज करवाना
  • इंजंक्शन (स्थगन आदेश) को निरस्त करवाना
  • कोर्ट रिकॉर्ड में झूठ और दुरुपयोग साबित करना

जब कोर्ट स्वयं देख लेती है कि केस झूठा है, तब FIR की स्थिति मजबूत होती है।


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लोग कौन-सी आम गलतियाँ करते हैं?

  • बिना आधार के सीधे FIR करा देना
  • सिविल केस लंबित रहते आपराधिक केस करना
  • गलत धाराओं में शिकायत दर्ज कराना

इन गलतियों से मामला उल्टा भी पड़ सकता है।


निष्कर्ष

फर्जी सिविल केस में FIR एक मजबूत हथियार है, लेकिन:

  • हर मामले में नहीं
  • हर चरण पर नहीं
  • बिना वकील की रणनीति के नहीं

सबसे सुरक्षित तरीका है –
पहले सिविल कोर्ट में झूठ साबित करना, फिर आपराधिक कार्रवाई करना।


यह लेख केवल सामान्य कानूनी जानकारी और जागरूकता के लिए है। यह किसी भी प्रकार की कानूनी सलाह या विज्ञापन नहीं है। यह Bar Council of India Rule 36 के अनुरूप है।