उत्तर प्रदेश में मौसमी संग्रह अमीन की पेंशन का अधिकार: राजेन्द्र बहादुर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य प्रकरण का विश्लेषण
यह लेख The Legal Warning India द्वारा प्रकाशित किया गया है तथा
अधिवक्ता उदय सिंह द्वारा लिखा गया है।
यह संप्रेषण केवल सामान्य विधिक जानकारी एवं जन-जागरूकता के उद्देश्य से है, न कि विधिक सलाह या विज्ञापन।
परिचय: निर्णय का महत्व
उत्तर प्रदेश में मौसमी संग्रह अमीन (Seasonal Collection Amin) की पेंशन संबंधी पात्रता
लंबे समय से विवाद का विषय रही है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ द्वारा
राजेन्द्र बहादुर सिंह एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य प्रकरण में दिया गया हालिया निर्णय
इस विषय पर स्थापित विधिक स्थिति को पुनः स्पष्ट करता है।
यह निर्णय विशेष रूप से उन मौसमी संग्रह अमीनों के लिए महत्वपूर्ण है, जिन्हें बाद में नियमित सेवा में
समायोजित (regularised) किया गया।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ताओं को वर्ष 1985 से 1996 के बीच विभिन्न अवधियों में मौसमी संग्रह अमीन के रूप में नियुक्त किया गया था।
लंबे समय तक मौसमी सेवा प्रदान करने के उपरान्त उनके नाम वर्ष 2012 से 2016 के मध्य तैयार की गई चयन सूचियों में सम्मिलित किए गए।
वर्ष 2016 में याचिकाकर्ताओं को विधिवत रूप से संग्रह अमीन के पद पर नियमित कर दिया गया।
सेवानिवृत्ति के पश्चात् संबंधित प्राधिकारियों ने उनकी मौसमी सेवा को पेंशन हेतु गणना में सम्मिलित करने से इंकार कर दिया,
जिसके परिणामस्वरूप यह रिट याचिका दायर की गई।
मुख्य विधिक प्रश्न
क्या नियमितीकरण से पूर्व मौसमी संग्रह अमीन के रूप में की गई सेवा को
पेंशन एवं अन्य सेवानिवृत्तिक लाभों हेतु अर्हकारी सेवा (qualifying service) में जोड़ा जा सकता है?
याचिकाकर्ताओं की ओर से प्रस्तुत तर्क
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि मौसमी सेवा को पेंशन से बाहर करना मनमाना एवं स्थापित न्यायिक दृष्टांतों के विपरीत है।
उन्होंने उच्च न्यायालय तथा उच्चतम न्यायालय के पूर्व निर्णयों पर भरोसा किया, जिनमें यह स्पष्ट किया गया है कि
पेंशन कोई अनुग्रह नहीं बल्कि दीर्घकालीन सेवा का प्रतिफल है।
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य सरकार की ओर से यह दलील दी गई कि मौसमी संग्रह अमीन किसी स्थायी या अस्थायी संवर्गीय पद पर नियुक्त नहीं होते,
अतः नियमितीकरण के पूर्व की सेवा को पेंशन हेतु नहीं जोड़ा जा सकता।
उच्च न्यायालय के निष्कर्ष एवं तर्क
उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार के तर्क को अस्वीकार करते हुए समन्वय पीठों द्वारा पूर्व में दिए गए निर्णयों का अनुसरण किया।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि एक बार मौसमी संग्रह अमीन को नियमित कर दिया जाता है,
तो केवल इस आधार पर उसकी पूर्व सेवा की अनदेखी नहीं की जा सकती कि प्रारम्भिक नियुक्ति मौसमी थी।
न्यायालय ने यह भी दोहराया कि पेंशन कोई दया या अनुकम्पा नहीं, बल्कि दीर्घ एवं निरंतर सेवा के बदले दिया जाने वाला अधिकार है।
न्यायालय द्वारा जारी निर्देश
- याचिकाकर्ताओं की संपूर्ण सेवा, जिसमें मौसमी सेवा भी सम्मिलित है, पेंशन हेतु गणना की जाएगी
- निर्धारित अवधि के भीतर पेंशन का पुनः निर्धारण किया जाएगा
- बकाया राशि का भुगतान कर पेंशन की निरंतरता सुनिश्चित की जाएगी
निर्णय से उभरती विधिक स्थिति
यह निर्णय इस विधिक सिद्धांत को सुदृढ़ करता है कि नियमितीकरण के पश्चात्
मौसमी संग्रह अमीन की सेवा को पेंशन से पृथक नहीं किया जा सकता।
प्रशासनिक प्राधिकारी स्थापित विधि के विरुद्ध तकनीकी आधारों पर पेंशन से इंकार नहीं कर सकते।
निष्कर्ष
राजेन्द्र बहादुर सिंह एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का निर्णय
सार्वजनिक सेवा में निष्पक्षता एवं न्याय के सिद्धांत को पुनः स्थापित करता है।
यह उत्तर प्रदेश के उन सभी मौसमी संग्रह अमीनों के लिए महत्वपूर्ण राहत प्रदान करता है,
जो पेंशन संबंधी लाभों से वंचित किए जा रहे थे।
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