This article is published by The Legal Warning India and written by Advocate Uday Singh.
किसानों की ज़मीन अधिग्रहण (Land Acquisition) में मुआवज़ा कम मिले तो क्या करें? – पूरा कानूनी समाधान
भारत में सड़क, हाईवे, रेलवे, इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट, स्मार्ट सिटी या सरकारी योजनाओं के नाम पर किसानों की ज़मीन अधिग्रहण (Land Acquisition) आम बात हो गई है।
लेकिन सबसे बड़ी समस्या तब होती है जब किसान को उसकी ज़मीन का मुआवज़ा बहुत कम दिया जाता है या बाजार कीमत से काफी नीचे तय किया जाता है।
इस लेख में हम आसान हिंदी में समझेंगे कि अगर किसान को कम मुआवज़ा मिला है तो कानूनी तौर पर क्या-क्या कदम उठाए जा सकते हैं।
ज़मीन अधिग्रहण क्या होता है?
जब सरकार या सरकारी एजेंसी किसी सार्वजनिक उद्देश्य (Public Purpose) के लिए किसान की ज़मीन लेती है, उसे भूमि अधिग्रहण कहा जाता है। इसके बदले किसान को मुआवज़ा दिया जाना कानूनन अनिवार्य है।
आम कारण जिनमें ज़मीन अधिग्रहण होता है
- नेशनल / स्टेट हाईवे
- रेलवे लाइन, मेट्रो
- इंडस्ट्रियल एरिया
- डैम, बिजली परियोजना
- सरकारी आवास या स्मार्ट सिटी
किसानों को मुआवज़ा कम क्यों मिलता है?
अक्सर किसानों को पूरा और सही मुआवज़ा नहीं मिल पाता, इसके पीछे कई कारण होते हैं:
- सरकार द्वारा कम सर्किल रेट के आधार पर गणना
- ज़मीन की सही कैटेगरी (Commercial / Irrigated) न मानना
- फसल, पेड़, ट्यूबवेल का मूल्य शामिल न करना
- सुनवाई (Hearing) का मौका न देना
- किसान की जानकारी के बिना अवॉर्ड पास कर देना
अगर मुआवज़ा कम मिले तो किसान क्या करें?
1️⃣ अवॉर्ड (Award) की कॉपी ज़रूर लें
सबसे पहले किसान को Land Acquisition Officer द्वारा जारी किया गया Award Order लेना चाहिए।
यही दस्तावेज़ आगे केस का आधार बनता है।
2️⃣ मुआवज़े पर आपत्ति दर्ज करें
अगर किसान को मुआवज़ा कम लगता है, तो वह लिखित रूप से आपत्ति दर्ज कर सकता है।
यह आपत्ति समय सीमा के अंदर देना बहुत ज़रूरी होता है।
3️⃣ Reference Court में मामला भेजने की मांग
किसान को अधिकार है कि वह Collector से मांग करे कि उसका मामला Reference Court भेजा जाए, ताकि न्यायालय सही मुआवज़ा तय कर सके।
4️⃣ बाज़ार मूल्य के सबूत पेश करें
Reference Court में किसान ये सबूत दे सकता है:
- आस-पास की ज़मीन की बिक्री रजिस्ट्री
- कमर्शियल उपयोग के प्रमाण
- फसल और पेड़ों का मूल्यांकन
- पहले के कोर्ट फैसले
5️⃣ ब्याज और अतिरिक्त मुआवज़े की मांग
कानून के अनुसार किसान को सिर्फ मूल मुआवज़ा ही नहीं, बल्कि:
- अतिरिक्त राशि
- सोलैटियम
- देरी पर ब्याज
का भी अधिकार होता है।
अगर किसान चुप रहे तो क्या नुकसान होगा?
बहुत से किसान जानकारी के अभाव में कुछ नहीं करते, जिससे:
- कम मुआवज़ा फाइनल हो जाता है
- बाद में कोर्ट जाने का अधिकार खत्म हो सकता है
- ब्याज और बढ़ा हुआ मुआवज़ा नहीं मिल पाता
- आने वाली पीढ़ी को नुकसान होता है
क्या हाई कोर्ट जाना संभव है?
अगर प्रक्रिया में गंभीर गड़बड़ी हो, सुनवाई न दी गई हो या कानून का उल्लंघन हुआ हो, तो किसान हाई कोर्ट में रिट याचिका भी दाखिल कर सकता है।
नोट: हर केस अलग होता है, इसलिए दस्तावेज़ देखकर ही सही रास्ता चुना जाना चाहिए।
किसानों के लिए जरूरी सलाह
- हर नोटिस और आदेश की कॉपी रखें
- समय सीमा (Limitation) न चूकें
- मौखिक बातों पर भरोसा न करें
- लिखित आपत्ति ज़रूर दर्ज करें
निष्कर्ष
किसान की ज़मीन उसकी सबसे बड़ी पूंजी होती है। अगर अधिग्रहण में मुआवज़ा कम दिया गया है, तो कानून किसान के साथ है।
ज़रूरत है सही जानकारी, समय पर कार्रवाई और कानूनी प्रक्रिया समझने की।
This article is for general legal information and awareness purposes only. It does not constitute legal advice or solicitation. Communication is purely informational, in compliance with Bar Council of India Rule 36.





