This article is published by The Legal Warning India and written by Advocate Uday Singh.
लंबे समय तक सहमति से रिश्ता और शादी न होना – क्या यह अपराध है?
परिचय: हालिया अदालत की टिप्पणी और उसका कानूनी अर्थ
हाल ही में प्रकाशित समाचार में यह स्पष्ट किया गया कि यदि दो वयस्क व्यक्ति लंबे समय तक आपसी सहमति से रिश्ते में रहे हों और बाद में विवाह न हुआ हो, तो केवल इस आधार पर उसे आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता।
यह टिप्पणी उन मामलों में महत्वपूर्ण है जहाँ रिश्ता टूटने के बाद शादी के वादे को आधार बनाकर आपराधिक मामला दर्ज कराया जाता है।
कानून यह नहीं कहता कि हर असफल रिश्ता अपराध है। आपराधिक कानून तभी लागू होता है जब शुरुआत से ही धोखाधड़ी की नीयत साबित हो।
सहमति (Consent) का कानूनी महत्व
भारतीय कानून के अनुसार, यदि दो वयस्क व्यक्ति अपनी स्वतंत्र इच्छा से रिश्ते में रहते हैं, तो उस संबंध को बाद में अपराध घोषित नहीं किया जा सकता। सहमति से बना रिश्ता व्यक्तिगत स्वतंत्रता के दायरे में आता है।
ऐसे मामलों में, यदि कोई पक्ष आपराधिक कार्यवाही शुरू करना चाहता है, तो आमतौर पर पहले
भेजा जाता है। लेकिन केवल नोटिस या आरोप से अपराध स्वतः सिद्ध नहीं होता।
शादी का वादा, धोखाधड़ी और आपराधिक नीयत
कई मामलों में यह आरोप लगाया जाता है कि शादी का झूठा वादा कर संबंध बनाए गए। लेकिन कानून यह देखता है कि:
- क्या शुरू से ही विवाह का वादा झूठा था?
- क्या किसी प्रकार का आर्थिक लाभ लिया गया?
- क्या सहमति दबाव, डर या भ्रम में ली गई थी?
यदि यह साबित नहीं होता कि शुरुआत से ही धोखाधड़ी की नीयत थी, तो बाद में शादी न होना अपराध नहीं माना जा सकता।
न्यायालय का संतुलित दृष्टिकोण
न्यायालयों ने बार-बार कहा है कि हर निजी विवाद को आपराधिक मुकदमे में नहीं बदला जा सकता।
इसी कारण, ऐसे मामलों में जहाँ सहमति स्पष्ट होती है, वहाँ आपराधिक कार्यवाही को रोका गया है।
ऐसे ही सिद्धांत
के मामलों में भी लागू किए जाते हैं, जहाँ केवल आरोप पर्याप्त नहीं होते।
झूठे मामलों और FIR के दुरुपयोग पर अदालत की चेतावनी
अदालतों ने यह भी माना है कि कई बार रिश्ते टूटने के बाद दबाव बनाने के लिए आपराधिक धाराओं का सहारा लिया जाता है।
ऐसे मामलों में, जब तथ्य अपराध का समर्थन नहीं करते, तो कार्यवाही को रद्द किया जा सकता है।
यह स्थिति
जैसे मामलों से मिलती-जुलती है, जहाँ कानून का दुरुपयोग रोकना आवश्यक हो जाता है।
व्यावहारिक प्रभाव
इस न्यायिक व्याख्या से यह स्पष्ट होता है कि:
- सहमति से बना रिश्ता अपराध नहीं है
- शादी न होना स्वतः धोखाधड़ी नहीं है
- हर मामले का निर्णय तथ्यों के आधार पर होगा
निष्कर्ष
लंबे समय तक सहमति से बना रिश्ता और बाद में विवाह न होना अपने-आप में अपराध नहीं है।
आपराधिक कानून तभी लागू होगा जब प्रारंभ से ही धोखाधड़ी और आपराधिक नीयत स्पष्ट रूप से सिद्ध हो।
यह न्यायिक दृष्टिकोण व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानून के संतुलन को बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।





















